Gurmeet singh chandhok

दिनांक 22 फरवरी 2025 को एक लिखित तहरीर थाना हल्द्वानी में पीड़िता के भाई द्वारा इस आशय से दी गई, कि मुलजिम द्वारा 3 साल से अपनी पहचान छुपा कर उसकी नाबालिक बहन का शारीरिक शोषण कर रहा था और जब मेरी बहन को पता चला कि मुलजिम मुसलमान धर्म से हैं तो मेरी बहन ने मुलजिम से बात करना बंद कर दिया, तो मुलजिम द्वारा उसे जान से मारने की धमकी दी गई। वादी मुकदमा की तहरीर के आधार पर मुलजिम के विरुद्ध धारा 376,506 भारतीय दंड संहिता एंड 5/6 पाक्सो एवं 3/4 उत्तराखंड धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम में अभियोग पंजीकृत
किया गया। मुलजिम 2 महीने 9 दिन हल्द्वानी जेल में निरुद्ध रहा।
पीड़िता के मेडिकल में कुछ नहीं आया व पीड़िता अपने बयानों में स्थिर नहीं रही जिस आधार पर अभियुक्त के ऊपर से 376 व 506 ईपीसी व 5/ 6 पोक्सो एवं 3 / 4 उत्तराखंड धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम को लोप किया गया।
न्यायालय में आरोप पत्र 354 (डी) आईपीसी व 11/12 पोक्सो अधिनियम में पेश किया गया।
अभियोजन द्वारा 06 गवाह पेश किए गए।
पीड़िता द्वारा अपने बयानों में बताया गया कि वह मुलजिम के साथ अपनी मर्जी से ब्लॉग बनती थी, उक्त ब्लॉक का नाम Shahid UK04 है जो पीड़िता शुरू से जानती थी,
—पीड़िता द्वारा यह भी बताया गया की घटना वाले दिन पीड़िता मुलजिम की बाइक चला रही थी और सीपीयू वालों ने उसे रोक लिया था और वह डर गई थी जिस डर के कारण उसने मुलजिम के खिलाफ एफआईआर लिखवा दी।
-मुलजिम द्वारा कभी भी पीड़िता को जान से मारने की धमकी नहीं दी गई।
पीड़िता के भाई ने अपने बयानों में बताया कि हमें हीरा नगर चौकी में बुलाया गया था और पुलिस वालों ने हमसे तहरीर लिखकर देने को कहा था।
न्यायालय द्वारा एवं निष्कर्ष दिया गया कि इस मामले में पीड़िता के सम्पूर्ण बयानों के अवलोकन करने के आधार पर यह स्पष्ट है कि पीडिता द्वारा उसके मुख्य परीक्षा व प्रतिपरीक्षा में पूर्णतया भिन्न घटनाक्रम बताते हुए विरोधाभासी बयान दिये गये हैं तथा पीडिता के के बयानों में आये उक्त तात्विक विरोधाभासों के आधार पर पीडिता के अभियुक्त द्वारा उसका पीछा करने व परेशान सम्बन्धी बताई गई घटना संदिग्ध हो जाती है तथा पीडिता के उक्त विरोधाभासी असम्पुष्ट बयानों के आधार पर अभियुक्त के विरूद्ध लगे आरोप युक्तियुक्त संदेह से परे साबित नहीं होते है
मुलजिम को करा दोषमुक्त।
