
प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और समाज के हर वर्ग की सक्रिय भागीदारी के बिना वन्यजीवों का संरक्षण संभव नहीं है। वन्यजीवों की सुरक्षा केवल सरकारी तंत्र या विशेषज्ञ संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि यह पूरे समाज का नैतिक कर्तव्य है। यह बात भारतीय वन सेवा के वरिष्ठ अधिकारी डॉ. धनंजय मोहन ने गुरुवार को दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में कही। अवसर था वाइल्डलाइफ प्रिजर्वेशन सोसाइटी (WPS) द्वारा आयोजित सात दिवसीय वन्यजीव फोटोग्राफी प्रदर्शनी के उद्घाटन और विशेष व्याख्यान का। एक अक्टूबर से 7 अक्टूबर 2026 तक चलने वाली इस प्रदर्शनी को आम जनता के लिए निशुल्क खोला गया है।
तस्वीरों में दिखी भारत की समृद्ध जैव विविधता
प्रदर्शनी में वाइल्डलाइफ प्रिजर्वेशन सोसाइटी के सदस्यों द्वारा खींचे गए दुर्लभ छायाचित्र प्रदर्शित किए गए हैं। ये तस्वीरें न केवल भारत के समृद्ध वन्यजीवन और पशु-पक्षियों के प्राकृतिक व्यवहार को दर्शाती हैं, बल्कि उनके प्राकृतिक आवासों पर मंडरा रहे पर्यावरणीय संकट की ओर भी ध्यान आकर्षित करती हैं।
‘अतीत से वर्तमान तक वन्यजीव संरक्षण की चुनौतियां’
‘भारत में वन्यजीव संरक्षण: अतीत से वर्तमान तक और मौजूदा चुनौतियां’ विषय पर अपने व्याख्यान में डॉ. धनंजय मोहन ने कहा कि संरक्षण केवल प्रजातियों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित रखने का अभियान है। उन्होंने बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि शहरीकरण और मानवीय दबाव से वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास सिकुड़ रहे हैं।
स्थानीय समुदायों की भूमिका और संतुलन
डॉ. मोहन ने जोर दिया कि संरक्षण नीतियों की सफलता के लिए स्थानीय समुदायों की जरूरतों को ध्यान में रखना आवश्यक है। उन्होंने कहा, “विकास और पर्यावरण सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना आज की सबसे बड़ी मांग है। इसके लिए वैज्ञानिक अध्ययन और समाज की भागीदारी का समन्वय जरूरी है।” व्याख्यान के बाद आयोजित प्रश्नोत्तर सत्र में शोधकर्ताओं और प्रकृति प्रेमियों ने वन्यजीव सह-अस्तित्व पर सवाल पूछे। इस दौरान शहर के अनेक गणमान्य नागरिक, पर्यावरणविद् और बड़ी संख्या में युवा उपस्थित रहे।
