
देहरादून की सरहद पर घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच स्थित मां डाटकाली मंदिर आस्था और इतिहास का अद्भुत संगम माना जाता है। सहारनपुर-देहरादून हाईवे पर बसे इस मंदिर की दूरी शहर से करीब 14 किलोमीटर है। यह स्थानीय लोगों के साथ-साथ यात्रियों के लिए भी विशेष महत्व रखता है।
देवी काली को समर्पित है डाटकाली मंदिर
मां डाटकाली मंदिर देवी काली को समर्पित है, जिन्हें देवी काली का ही रूप माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, देवी काली को भगवान शिव की अर्धांगिनी देवी सती का ही एक स्वरूप माना जाता है। यही कारण है कि इस मंदिर को काली मंदिर और मनोकामना सिद्धपीठ के नाम से भी जाना जाता है, जहां श्रद्धालु अपनी इच्छाएं लेकर पहुंचते हैं।
डाटकाली मंदिर का इतिहास (datkali temple history)
मंदिर के इतिहास से जुडी एक दिलचस्प कथा भी प्रचलित है। कहा जाता है कि अंग्रेजी शासनकाल के दौरान जब देहरादून से सहारनपुर को जोड़ने वाली सड़क और सुरंग का निर्माण कार्य किया जा रहा था, तब बार-बार पहाड़ से मलबा गिरने के कारण निर्माण कार्य बाधित हो रहा था। सात के समय सुरंग बार-बार बंद हो जाती थी। जिससे इंजीनियर और मजदूर परेशान हो गए थे।
अंग्रेज इंजीनियर को सपने में मां ने दिए थे दर्शन
निर्माण कार्य देख रहे एक अंग्रेज इंजीनियर के सपने में मां दतकाली के दर्शा हुए। मां ने उसे बताया कि जिस स्थान पर सुरंग बनाई जा रही है, वहीं उनकी मूर्ति दबी हुई है। यानी उस मूर्ति को निकालकर सड़क किनारे स्थापित कर दिया जाए, तो निर्माण कार्य बिना किसी बाधा के पूरा हो जाएगा।
मंदिर निर्माण के बाद पूरा हुआ सुरंग का निर्माण
अगले ही दिन खुदाई के दौरान मां की मूर्ति की बात कही जाती है। इसके बाद उस मूर्ति को ब्रिटिश इंजीनियर ने महंत सुखबीर गुसाईं को सौंप दिया था और वहीं मंदिर का निर्माण कराया। मान्यता है कि इसके बाद सुरंग और सड़क निर्माण बिना किसी रुकावट के पूरा हो गया।
100 सालों से मंदिर में लगातार जल रही अखंड ज्योति
मंदिर से जुड़ी एक और खास मान्यता है कि यहां पिछले करीब 100 सालों से अखंड ज्योति लगातार जल रही है, जो भक्तों के लिए आस्था का प्रतिक है। मान्यता ये भी है कि अगर कोई श्रद्धालु मंगलवार से लगातार 11 दिनों तक ‘डाट चालीसा’ का पाठ करता है, तो मां उसकी मनोकामना अवश्य पूरी करती हैं
