दीपक अधिकारी
हल्द्वानी
नैनीताल – उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में राज्य अनुसूचित जाति आयोग द्वारा पारित बेदखली आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि आयोग केवल सिफारिश करने वाला निकाय है और उसे बाध्यकारी आदेश जारी करने का अधिकार नहीं है। न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ ने यह निर्णय राजेंद्र प्रसाद कबटियाल की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिका में मई 2024 में पारित उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें आयोग ने राज्य अधिकारियों को याचिकाकर्ता को एक भूखंड से बेदखल करने का निर्देश दिया था।सुनवाई के दौरान आयोग की ओर से बताया गया कि याचिकाकर्ता द्वारा कथित रूप से भूमि पर अवैध कब्जे के संबंध में साक्ष्य जुटाए गए थे, जिनके आधार पर यह आदेश जारी किया गया। हालांकि आयोग ने स्वयं स्वीकार किया कि उसे केवल सिफारिश करने का अधिकार है, सीधे कार्रवाई का नहीं। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि आयोग ने अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया है। अदालत ने आदेश को निरस्त करते हुए पक्षकारों को कानून के तहत उपलब्ध अन्य वैधानिक उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी।
किसानों को भी बड़ी राहत –
इसी के साथ हाईकोर्ट ने उधमसिंह नगर जिले में ग्रीष्मकालीन धान की खेती पर लगाए गए प्रतिबंध को भी रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि बिना किसी कानूनी आधार के किसानों को उनकी पसंद की फसल उगाने से नहीं रोका जा सकता। यह मामला जिला प्रशासन के 4 फरवरी 2026 के आदेश से जुड़ा था, जिसमें केवल जलभराव वाले खेतों में ही ग्रीष्मकालीन धान की अनुमति दी गई थी, जबकि अन्य क्षेत्रों में इस पर रोक लगा दी गई थी।राज्य सरकार ने अपने पक्ष में दलील दी कि यह निर्णय वैज्ञानिक संस्थानों की सलाह पर आधारित है, जिनके अनुसार गर्मियों में धान की खेती से भूजल स्तर घटता है और मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है। वहीं किसानों की ओर से पेश वकीलों ने तर्क दिया कि किसी भी प्रतिबंध के लिए कानूनी आधार होना आवश्यक है। अदालत ने किसानों की दलीलों को स्वीकार करते हुए प्रशासन के आदेश को निरस्त कर दिया और स्पष्ट किया कि किसान अपनी भूमि पर किसी भी प्रकार की फसल उगाने के लिए स्वतंत्र हैं, चाहे खेत जलमग्न हों या नहीं। यह फैसला राज्य में प्रशासनिक अधिकारों और किसानों के अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
