
नैनीताल: नैनीताल जिले के धारी गांव में रहने वाले तीन भाई एक ऐसी दुर्लभ आनुवांशिक बीमारी से जूझ रहे हैं, जिसके कारण सूरज ढलते ही उनकी नजर लगभग खत्म हो जाती है। बीमारी ने उनके शरीर पर भी असर छोड़ा है। तीनों के हाथ-पैरों की कुल उंगलियां 75 से अधिक हैं। उनका भोजन भी आम लोगों से कई गुना ज्यादा है। हर भाई एक बार में 15 रोटियां, सब्जियां और थाली भरकर चावल खा लेता है। जिससे दिहाड़ी पर निर्भर इस परिवार पर अपने खाने का खर्च भी भारी पड़ता है।
धारी गांव में 34 साल के बालम सिंह, उनके दो छोटे भाई गौरव 29 और कपिल 25 रहते हैं। तीनों के लिए जिंदगी सुबह सूरज उगने से लेकर शाम को सूरज ढ़लने तक की की है। सूरज ढ़लने से पहले तीनों को घर वापस लौटना होता है। एक दुलर्भ आनुवांसिक सिंड्रोम जो 5 लाख में एक व्यक्ति को होता है। उसके कारण उनके शरीर में इतनी परेशानियां हैं कि उनका जीवन ही बेहद दूर्भर हो गया है। इसलिए तीनों भाई आज तक पूरी तरह अपनी मां सावित्री देवी पर ही निर्भर हैं। Thirdpole ने उनके जीवन की इन दुश्वारियों पर एक डॉक्यूमेंट्री भी बनाई है।
दिल में 8 एमएम का छेड भी
मां सावित्री देवी बताती हैं कि बालम के पिता मजदूरी करते थे, बचपन में उसे डॉक्टर को दिखाया। उसके दिल में 8 एमएम का छेद था। इलाज में बहुत पैसा लगा, बाद में दोनों बेटों में भी यही परेशानी नजर आई। दो साल पहले इसी चिंता में पति की मृत्यु हो गई। बालम अब गांव में ही अपनी ओर लोगों की बकरियां चराता है, गौरव स्टोन क्रेशर में दिहाड़ी करता है और सबसे छोटा कपिल एक होटल में बर्तन धोता है। पर तीनों के लिए रात होते ही जीवन में अंधेरा छा जाता है। खाना बनाना, खिलाने, से लेकर हर तरह के कामों के लिए तीनों बच्चे आज भी अपनी मां के ही भरोसे हैं।
लॉरेंस-मून-बेडिल सिंड्रोम है वजह
डॉक्टरों के अनुसार तीनों भाई दुलर्भ लॉरेंस–मून–बेडिल सिंड्रोम से पीड़ित हैं। यह जीन में म्यूटेशन की वजह से होता है, और माता-पिता से विरासत में बच्चों तक पहुंच जाता है। पर तीनों बच्चों में एक साथ इस तरह के लक्ष्ण् बहुत दुलर्भ है। इसमें आंखों का रेटीना धीरे-धीरे कमजोर हो जाता है, जिससे बिना सूरज की रोशनी के दिखना कम या धुंधला हो जाता है। कई मामलों में उम्र बढ़ने के साथ रोशनी पूरी तरह चली भी जाती है। हाथ-पैरों में अतिरिक्त उंगलियां, मोटापा, हार्मोन और त्वचा की दिक्कतें आम हैं। इसका स्थाई इलाज नहीं है, लेकिन सावधानी और नियमित देखभाल से इनके असर को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।
लोग फायदा उठाते हैं फटे नोट दे जाते हैं
दूसरे नंबर का गौरव दिहाड़ी मजदूरी करता है। वो बताता है कि लोग उसकी इस परेशानी का फायदा उठाते हैं। अक्सर उसे खराब या फटे हुए नोट दे जाते हैं। उसकी मां के पास फटे या खराब नोट बहुत हैं। बकरियां चराने वाला बालम के लिए भी चुनौती होती है कि वो शाम से पहले घर लौट आता है। खाने के बाद वो सीधे सो जाते हैं। सरकार इन्हें विकलांग पेंशन के रूप में 1500 रूपए महीना देती है, पर इस परिवार की मांग ऐसी व्यवस्था की है जहां उनका जीवन आसान हो सके।
