Gurmeet singh chandhok
भारत की प्रमुख अंतरिक्ष एजेंसी इसरो के नौ कर्मचारी संगठनों ने इसरो अध्यक्ष वी. नारायणन को पत्र लिखकर अंतरिक्ष एजेंसी के विनिर्माण और संचालन से जुड़े कामों को निजी संस्थाओं को सौंपे जाने की प्रस्तावित योजना पर आधिकारिक स्पष्टीकरण मांगा है. पत्र में कर्मचारियों की मुख्य चिंता सार्वजनिक धन से विकसित की गई तकनीकों को निजी कंपनियों को हस्तांतरित किए जाने को लेकर है

नई दिल्ली: सरकार द्वारा अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने के छह साल बाद इसरो के हजारों कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करने वाले नौ कर्मचारी संगठनों ने अंतरिक्ष एजेंसी के विनिर्माण और संचालन से जुड़े कार्यों को निजी संस्थाओं को सौंपे जाने की प्रस्तावित योजना पर आधिकारिक स्पष्टीकरण मांगा है.
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, 4 सितंबर को इसरो के अध्यक्ष और अंतरिक्ष विभाग (DoS) के सचिव वी. नारायणन को लिखे पत्र में इन कर्मचारी संगठनों ने सरकार की निजीकरण नीति, भविष्य में इसरो की भूमिका और मौजूदा कर्मचारियों और भविष्य में होने वाली भर्तियों पर इसके प्रभाव को लेकर स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है.
रिपोर्ट के अनुसार, क्या इसरो, भारत का प्रमुख अंतरिक्ष निकाय, केवल अपनी प्रौद्योगिकियों को निजी क्षेत्र में स्थानांतरित करने के लिए नवाचार करेगा, इस क्षेत्र में प्रवेश करने वाले कॉर्पोरेट दिग्गजों को प्रभावी ढंग से सब्सिडी देगा? इसरो अध्यक्ष वी. नारायणन को लिखे एक पत्र में वैज्ञानिकों और कर्मचारियों द्वारा उठाई गई यह प्राथमिक चिंता है.
यह पत्र इंडियन नेशनल स्पेस प्रमोशन एंड ऑथराइजेशन सेंटर (IN-SPACe) के प्रमुख पवन गोयनका द्वारा हाल ही में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में दिए गए विस्तृत बयान के बाद लिखा गया है.
गोयनका ने इंडिया टुडे के एक कार्यक्रम में कहा था, ‘आखिरकार इसरो कोई भी लॉन्च व्हीकल खुद नहीं बनाएगा. यह काम निजी क्षेत्र या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (पीएसयू) करेंगे. वे रोजमर्रा के इस्तेमाल वाले उपग्रह (सैटेलाइट) भी नहीं बनाएंगे. वे ऐसे उपग्रह बनाएंगे जो विशेष उद्देश्यों के लिए हों, वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए विशेष कक्षाओं में भेजे जाने वाले हों या नई तकनीक विकसित करने के लिए हों, जिसे बाद में निजी क्षेत्र को हस्तांतरित कर दिया जाएगा.’
इसरो की विभिन्न इकाइयों और अलग-अलग कार्यक्षेत्रों से जुड़े कर्मचारियों द्वारा लिखे गए इस पत्र में कहा गया है कि इसरो पहले ही उद्योग जगत को करीब 120 तकनीकें हस्तांतरित कर चुका है. इनमें स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (एसएसएलवी) और पीएसएलवी जैसी तकनीकें भी शामिल हैं.
कर्मचारियों ने यह भी बताया कि तमिलनाडु के कुलशेखरपट्टनम में विकसित किया जा रहा नया अंतरिक्ष प्रक्षेपण केंद्र भी मुख्य रूप से छोटे उपग्रहों के प्रक्षेपण पर केंद्रित होने की उम्मीद है, जबकि इस क्षेत्र में निजी कंपनियों की क्षमता पहले से काफी विकसित हो चुकी है.
इनस्पेस (IN-SPACe) की शुरुआत मोदी सरकार ने वर्ष 2020 में की थी. इसका उद्देश्य ऐसे अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों के प्रवेश को बढ़ावा देना था, जिस पर अधिकांश समय सरकारी क्षेत्र का एकाधिकार रहा है. इसके प्रमुख के रूप में पवन गोयनका को नियुक्त किया गया.
गोयनका ने कई दशकों तक वाहन निर्माता कंपनी महिंद्रा में काम किया और कंपनी की लोकप्रिय एसयूवी स्कॉर्पियो के विकास को दिशा देने का श्रेय उन्हें दिया जाता है. अंतरिक्ष और ऑटोमोबाइल क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें 2025 में ‘व्यापार और उद्योग’ श्रेणी में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था.
इसरो कर्मचारियों के पत्र में कहा गया है कि पहले यह विचार था कि निजी क्षेत्र की कंपनियां सार्वजनिक क्षेत्र की मदद करेंगी, खासकर उन सेवाओं में जो जरूरी या अनिवार्य नहीं हैं. लेकिन अब ऐसा लगता है कि इस सोच में बदलाव कर दिया गया है और इस बदलाव के बारे में कर्मचारियों को विश्वास में नहीं लिया गया.
कर्मचारियों ने इसरो के अध्यक्ष से मांग की है कि वे इस बात पर ‘लिखित स्पष्टीकरण’ जारी करें कि गोयनका के बयान क्या भारत सरकार, अंतरिक्ष आयोग या अंतरिक्ष विभाग द्वारा लिए गए किसी ‘स्वीकृत निर्णय’ को दर्शाते हैं.
पत्र में यह चिंता भी जताई गई है कि अगर अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में काम करने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) को भी निर्माण कार्य से बाहर कर दिया जाएगा, तो कर्मचारियों को क्या सुरक्षा और संरक्षण मिलेगा.
हालांकि, पत्र में मुख्य चिंता सार्वजनिक धन से विकसित की गई तकनीकों को निजी कंपनियों को हस्तांतरित किए जाने को लेकर है.
पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले कर्मचारी संगठनों ने गोयनका द्वारा बताए गए कार्यों को इसरो की ‘मुख्य विशेषज्ञता (core competence)’ बताया है.
इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, इन संगठनों ने चेतावनी दी है कि इन गतिविधियों से इसरो के पीछे हटने से संगठन की दीर्घकालिक व्यवहार्यता पर खतरा पैदा हो सकता है
