Gurmeet singh chandhok

रुद्रपुर/हल्द्वानी। बहुचर्चित धनंजय गिरी प्रकरण में दिनांक 01 जून को माननीय एडीजे न्यायालय द्वारा अभियुक्त धनंजय गिरी की जमानत याचिका निरस्त कर दी गई। न्यायालय द्वारा पारित आदेश में अभियोजन पक्ष के तर्कों का उल्लेख करते हुए यह भी दर्ज किया गया है कि वर्ष 2017 से वर्ष 2022 तक धनंजय गिरी द्वारा राज्य कर विभाग (GST) का लगभग 7.90 करोड़ रुपये का कर जमा नहीं किया गया, जिससे राज्य को आर्थिक क्षति पहुंची।
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि जिस समय पंजाब नेशनल बैंक द्वारा संबंधित परियोजना के लिए ऋण स्वीकृत किया गया, उससे पूर्व धनंजय गिरी द्वारा उक्त संपत्ति से संबंधित सात-आठ पंजीकृत एग्रीमेंट उप-पंजीयक (सब-रजिस्ट्रार) कार्यालय, हल्द्वानी में विधिवत अनुबंधित एवं पंजीकृत कराए जा चुके थे।

शिकायतकर्ताओं ने प्रश्न उठाया है कि करोड़ों रुपये की जीएसटी देनदारी तथा पूर्व से पंजीकृत इन एग्रीमेंटों के बावजूद बैंक द्वारा आवश्यक सत्यापन, विधिक परीक्षण एवं दस्तावेजों की जांच किस प्रकार की गई तथा इतनी बड़ी राशि का ऋण किन परिस्थितियों में स्वीकृत किया गया। उनका कहना है कि यह संपूर्ण प्रकरण निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच का विषय है।
न्यायालय के आदेश में दर्ज इन तथ्यों के सामने आने के बाद शिकायतकर्ताओं ने पंजाब नेशनल बैंक के संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि जब किसी व्यक्ति पर करोड़ों रुपये की जीएसटी देनदारी लंबित थी, तब बैंक द्वारा उसकी वित्तीय स्थिति, कर देनदारियों, परियोजना की वैधता तथा अन्य आवश्यक अभिलेखों का परीक्षण किस प्रकार किया गया, यह गंभीर जांच का विषय है।
शिकायतकर्ताओं के अनुसार बैंकिंग नियमों के तहत बड़े ऋण स्वीकृत करने से पूर्व आवेदक की वित्तीय साख, कर अनुपालन, संपत्ति संबंधी अभिलेखों तथा अन्य कानूनी पहलुओं का विस्तृत परीक्षण किया जाता है। ऐसे में यदि इतनी बड़ी वित्तीय देनदारी और अन्य गंभीर परिस्थितियों के बावजूद ऋण स्वीकृत किया गया, तो यह जांच आवश्यक हो जाती है कि कहीं प्रक्रिया में घोर लापरवाही अथवा किसी प्रकार की अनियमितता तो नहीं हुई।
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि इस पूरे प्रकरण में केवल बैंक को ही नहीं, बल्कि अनेक निवेशकों, फ्लैट खरीदारों तथा आम नागरिकों को भी आर्थिक एवं मानसिक क्षति का सामना करना पड़ा है। उनका मानना है कि यदि समय रहते आवश्यक सावधानी और सत्यापन किया गया होता, तो संभवतः इतने बड़े स्तर पर लोगों को नुकसान नहीं उठाना पड़ता।
शिकायतकर्ताओं ने शासन, प्रशासन तथा संबंधित जांच एजेंसियों से मांग की है कि पंजाब नेशनल बैंक के उन अधिकारियों की भूमिका की भी निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, जिन्होंने ऋण स्वीकृति एवं उससे संबंधित प्रक्रियाओं में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भूमिका निभाई थी। साथ ही यह भी जांच की जाए कि ऋण स्वीकृति के समय उपलब्ध तथ्यों एवं अभिलेखों का समुचित मूल्यांकन किया गया था या नहीं।
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि इतने बड़े वित्तीय विवाद, करोड़ों रुपये की जीएसटी देनदारी, पूर्व से पंजीकृत एग्रीमेंट तथा अन्य महत्वपूर्ण तथ्यों के बावजूद जिम्मेदार व्यक्तियों की जवाबदेही निर्धारित नहीं की जाती, तो इससे जनता का बैंकिंग व्यवस्था एवं सरकारी संस्थाओं पर विश्वास प्रभावित हो सकता है। उन्होंने कहा कि जनहित एवं राष्ट्रहित में पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कर दोषी पाए जाने वाले सभी व्यक्तियों के विरुद्ध कानून के अनुसार उचित कार्रवाई की जानी चाहिए, ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके और जनता का विश्वास न्याय व्यवस्था तथा वित्तीय संस्थाओं में बना रहे।
यह ड्राफ्ट प्रेस विज्ञप्ति की शैली में तैयार है और इसमें जीएसटी देनदारी तथा सब-रजिस्ट्रार कार्यालय, हल्द्वानी में पूर्व से पंजीकृत एग्रीमेंट का तथ्य भी समाहित कर दिया गया है।
